
भारतीय दण्ड संहिता, 1860—धारा 498A, 406 सहपठित धारा 34—दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961—धारा 3 व 4—दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973—धारा 482—भारतीय संविधान—अनुच्छेद 226—दोष-सिद्धि के विरुद्ध अपील—विवाह के समय दिए गए सामान, गहने, घरेलू वस्तुएँ आदि, यदि दहेज प्रतिषेध अधिनियम के अनुसार उनकी कोई विधिक सूची (dowry list) तैयार नहीं की गई हो, तो उन्हें सामान्य वैवाहिक उपहार (customary gifts) माना जाएगा, दहेज नहीं—हिन्दू विवाह में फर्नीचर, घरेलू सामान और सोने के आभूषण देना सामान्य परंपरा का हिस्सा माना जाता है—सिर्फ विवाह में सामान देना, अपने-आप में दहेज का अपराध का अपराध गठित नहीं करता—जब तक यह साबित न हो कि बाद में अतिरिक्त दहेज की माँग की गई और उसके लिए उत्पीड़न किया गया, तब तक दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 व 4 के तहत अपराध सिद्ध नहीं होता—यदि वास्तव में दहेज की माँग की जा रही थी, तो पत्नी और उसके माता-पिता उस माँग को ठुकराकर संबंध समाप्त कर सकते थे—रिकॉर्ड के अनुसार, विवाह के समय दिए गए सामान और बाद में एक पुत्र के जन्म के अलावा ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं था जिससे यह माना जा सके कि पति द्वारा बार-बार दहेज माँगा गया और पत्नी को लगातार प्रताड़ित किया गया—इसलिए विवाह के बाद लगातार दहेज माँगने का आरोप अविश्वसनीय और साक्ष्यहीन पाया गया तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम के अंतर्गत की गई दोष-सिद्धि उचित नहीं।
