Arunachala Gounder v/s Ponnusamy..2022 AIR(SC) 695: (2022) 286 DLT 610 : (2022) 1 KLT 628.. Civil Appeal No. 6659 of 2011…

■ एक पुत्री अपने पिता की स्व-अर्जित सम्पत्ति को वैसे ही प्राप्त करने की अधिकारिणी है जैसे कि कोई पुत्र। मृतक हिन्दू के कोई पुरूष संतान ना होने पर उसकी सम्पत्ति की हकदार पुत्री होगी न कि उस मृतक का कोई समानोदक/सपिण्ड व्यक्ति।

■ यदि किसी हिन्दू स्त्री की मृत्यु बिना वसीयत किए होती है और उसने अपनी सम्पत्ति अपने माता-पिता से दाय में प्राप्त की थी, तब वह सम्पत्ति उसके माता-पिता के उत्तराधिकारियों को वापिस चली जायेगी और यदि सम्पत्ति अपने पति या श्वसुर से विरासत में प्राप्त की थी, तब वह उसके पति के उत्तराधिकारियों में चली जायेगी।

■ धर्मशास्त्रों को संहिताओं (Codes) के रूप में देखा जाता है। जैसे—बंगाल में दायभाग, बम्बई, गुजरात, कोंकण में मयूख, केरल में नम्बूदरी या मारूमकट्टयम तथा भारत के शेष भाग में मिताक्षरा।

■ “व्यवस्थिका-चन्द्रिका”, अ डाइजेस्ट ऑफ हिन्दू लॉ (1878) के धारा 2 में पुत्रियों के उत्तराधिकार का वर्णन है। इसी पुस्तक में विष्णु-संहिता’, बृहस्पति-संहिता’, ‘मनु-संहिता’ एवं ‘नारद-स्मृति’ का उल्लेख भी किया गया है, जिसके अनुसार—

(i) विष्णु-संहिता—एक व्यक्ति, जिसकी कोई पुरुष संतान नहीं है, का धन उसकी पत्नी को जाता है और उसके बाद उसकी पुत्री को, ना कि उसके भाई को।

(ii) बृहस्पति-संहिता—पत्नी अपने पति की सम्पत्ति की उत्तराधिकारी है और उसके ना रहने पर उसकी पुत्री।

(iii) मनु-संहिता—एक व्यक्ति का पुत्र स्वयं वह ही है और पुत्री पुत्र के समान होती है। कैसे कोई अन्य व्यक्ति सम्पत्ति को दाय में प्राप्त कर सकता है।

(iv) नारद-स्मृति—पुत्र और विधवा की अनुपस्थिति में पुत्री ही है जो पुत्र के समान उत्तराधिकार प्राप्त करेगी।
*
*

0Shares

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *