गिरफ्तारी एवं रिमांड— संवैधानिक सुरक्षा के अधिकार—अनुच्छेद 22(1) एवं दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 50—अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन—गिरफ्तारी के कारणों को लिखित रूप में न बताना—रिमांड कार्यवाही में प्रक्रियागत चूक—विधिक सहायता का अधिकार—मजिस्ट्रेट द्वारा न्यायिक परीक्षण—गिरफ्तारी के समय गिरफ्तारी के कारणों को लिखित रूप में न बताना संविधान के अनुच्छेद 22(1) तथा दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 50 का स्पष्ट उल्लंघन है—केवल प्रिंटेड प्रारूप में गिरफ्तारी ज्ञापन (अरेस्ट मेमो) प्रदान किया जाना जिसमें विशिष्ट कारणों का उल्लेख न हो, विधिक दृष्टि से अपर्याप्त है—कानूनी सहायता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है जिसकी जानकारी आरोपी को दी जानी अनिवार्य है—रिमांड मजिस्ट्रेट का कर्तव्य है कि वह प्रकरण में न्यायिक मस्तिष्क (judicial mind) का प्रयोग करे तथा आरोपी को रिमांड का विरोध करने का उचित अवसर प्रदान करे—अनुच्छेद 22(1) के अनुपालन की जिम्मेदारी जाँच एजेंसी पर होती है जिसे वह प्रमाणित करने के लिए बाध्य है—गिरफ्तारी के पश्चात चार्जशीट का दाखिल किया जाना गिरफ्तारी में हुई अवैधानिकता को वैध नहीं बना सकता—जब गिरफ्तारी के दौरान अनुच्छेद 21 और 22 का उल्लंघन प्रमाणित हो जाता है तो ऐसे मामलों में वैधानिक प्रतिबंधों के बावजूद आरोपी को जमानत पर रिहा किया जाना न्यायसंगत है—उत्तर प्रदेश राज्य में अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश जारी किए जाते हैं—साथ ही सभी पुलिस अधिकारियों को परिपत्र (सर्कुलर) निर्गत किया जाए जिससे उपर्युक्त संवैधानिक एवं विधिक प्रावधानों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित हो सके।

