S.A Gaur v/s State of NCT of Delhi..Crl Appeal no. – 560 of 2020…

चैक अनादरण—उपधारणा—खंडन—धारा 118(क) एवं 139, एन०आई० एक्ट के अंतर्गत उत्पन्न विधिक उपधारणाएं खंडनीय होती हैं—अभियुक्त प्रारंभिक दायित्व का निर्वहन इस प्रकार कर सकता है जब वह संभावनाओं की प्रबलता (preponderance of probabilities) के आधार पर यह दर्शा दे कि उसके ऊपर परिवादी द्वारा दिया गया ऋण या देयता बकाया नहीं है—यदि न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि अभियुक्त द्वारा प्रस्तुत बचाव प्रथम दृष्टया संभाव्य है, तो अभियुक्त के विरुद्ध उक्त धाराओं के अंतर्गत प्रदत्त उपधारणा समाप्त हो जाती है—इसके पश्चात कानूनी दायित्व पूर्ण रूप से परिवादी (शिकायतकर्ता) पर आ जाता है कि वह यह तथ्यतः सिद्ध करे कि संबंधित ऋण/देयता वास्तविकता में बकाया है—यदि परिवादी ऋण के दायित्व को सिद्ध करने में विफल रहता है तो ऐसे प्रकरण में परिवाद का खारिज किया जाना अनिवार्य हो जाता है।

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