
वैवाहिक क़ानून के अंतर्गत, पति या पत्नी द्वारा जानबूझकर एवं योजनाबद्ध रूप से भावनात्मक सहयोग, स्नेह तथा साथ निभाने से वंचित करना, मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। इस प्रकार की जानबूझकर की गई उपेक्षा, विवाह के मूल कर्तव्यों का गंभीर उल्लंघन करती है, जिससे मनोवैज्ञानिक क्षति एवं भावनात्मक पीड़ा उत्पन्न होती है और जो वैवाहिक संबंध के मूल उद्देश्य को ही कमजोर कर देती है। व्यक्तियों को एक मृत विवाह में बने रहने के लिए विवश करना न तो न्याय के हित में है और न ही पति-पत्नी के कल्याण में—अतः अधीनस्थ न्यायालय द्वारा धारा 13(1)(i-a) के अंतर्गत विवाह विच्छेद याचिका अस्वीकार करने का निर्णय निरस्त किया गया तथा अपील आंशिक रूप से स्वीकार की गई, जिससे अपीलकर्ता को विवाह विच्छेद का अधिकार प्रदान किया गया।
