“Further Investigation (अग्रिम विवेचना) क्या है और यह कब संभव है?…

📘 “Further Investigation (अग्रिम विवेचना) क्या है और यह कब संभव है?

🔍 परिचय:

बहुत से पाठकों के द्वारा प्रश्न पूछा गया है कि जब पुलिस एक आपराधिक मामले की जाँच पूरी कर लेती है और चार्जशीट (Charge Sheet) या अंतिम रिपोर्ट (Final Report) न्यायालय में दाखिल कर देती है, अगर पुलिस के द्वारा सही जाँच नहीं की गई है तो क्या फिर से जांच हो सकती है?

✅ उत्तर है – हाँ, जब तक आरोप तय (Framing of Charges) नहीं हो जाते, तब तक Further Investigation (अग्रिम या पूरक जांच) का विकल्प खुला रहता है।

इस लेख में हम चर्चा करेंगे कि :
• Further Investigation क्या है?
• यह कब और कैसे हो सकती है?
• इसके लिए क्या कानूनी प्रावधान हैं (BNSS और CrPC)?
• सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण निर्णय कौन-कौन से हैं?

⚖️ Further Investigation क्या है? (परिभाषा)

Further Investigation (अग्रिम/पूरक जांच) वह प्रक्रिया है जिसके तहत:

“पुलिस पहले से दर्ज FIR की जाँच पूरी कर चार्जशीट दाखिल करने के बाद, अगर किसी नए सबूत या तथ्य की जानकारी मिले, या जाँच अपूर्ण, पक्षपातपूर्ण या गलत दिशा में हो, तो वह दुबारा जांच करती है।”

यह न सिर्फ पुलिस का अधिकार है बल्कि वादकारी (Complainant) और अभियुक्त (Accused) के लिए भी कानूनी रास्ता है।

📜 BNSS और CrPC में क्या प्रावधान हैं?

🔹 CrPC Section 156(3), 173(8)

“Police को यदि जांच के बाद भी नए साक्ष्य मिले तो वह मजिस्ट्रेट की अनुमति से Further Investigation कर सकती है और पूरक रिपोर्ट (Supplementary Report) दाखिल कर सकती है।वादी सा अभियुक्त भी न्यायालय में प्रार्थना पत्र दे सकते हैं ।”

🔹 BNSS धारा 193(9) (CrPC 173(8) का समकक्ष)

“यदि कोई पुलिस अधिकारी जांच के दौरान या बाद में अतिरिक्त सबूत पाए, तो वह Further Investigation कर सकता है।
Trial Court की अनुमति से यह जांच Trial शुरू होने के बाद भी हो सकती है।”

🔸 यानी BNSS के तहत:
• चार्जशीट के बाद भी पूरक जांच संभव है
• ट्रायल शुरू होने के बाद भी अदालत की अनुमति से जांच संभव है
• Supplementary Charge Sheet दाखिल की जा सकती है

Further Investigation कब हो सकती है?

✅ 1. चार्जशीट दाखिल होने के बाद लेकिन ट्रायल शुरू होने से पहले (आरोप बनने से पूर्व )
• इस समय मजिस्ट्रेट स्वतः या आवेदन पर आगे की जांच का आदेश दे सकता है।

✅ 2. चार्जशीट में किसी आरोपी को छोड़ दिया गया हो
• वादी को लगे कि पुलिस ने किसी दोषी व्यक्ति को जानबूझकर बचाया है।

✅ 3. आरोपी को लगे कि जांच अधूरी थी
• उसे साक्ष्य नहीं दिखाने दिया गया या पुलिस ने पक्षपात किया।उसे गलत फँसाया गया जबकि उसके निर्दोष होने के पर्याप्त साक्ष्य थे ।

✅ 4. नए साक्ष्य सामने आए हों
• जिसे पुलिस ने पहले नहीं देखा या नजरअंदाज किया।

✅ 5. अदालत स्वयं महसूस करे कि जाँच अधूरी थी
• विशेषकर जहां गवाहों के बयान नहीं लिए गए हों या फॉरेंसिक रिपोर्ट नहीं जोड़ी गई हो।

👩‍⚖️ मजिस्ट्रेट के पास आवेदन कौन दे सकता है?

  1. वादी (Complainant):

→ जब उसे लगता है कि जांच अधिकारी ने पक्षपात किया है और आरोपी को जानबूझकर छोड़ा है, जानबूझकर उसके साक्ष्यों को छिपाकर अन्तिम आख्या प्रेषित की है या कुछ अभियुक्तों को जिनके विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य थे उनके नाम विवेचना में निकाल दिये गये हैं ।

  1. अभियुक्त (Accused):

→ जब उसे लगता है कि जांच अधूरी थी, झूठे साक्ष्य पर आधारित थी, या उसके द्वारा दिए गए साक्ष्य को नजरअंदाज किया गया।

  1. स्वतः संज्ञान (Court’s own motion):

→ मजिस्ट्रेट स्वयं मामले की प्रकृति देखकर Further Investigation का आदेश दे सकता है।

⚖️ महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट के निर्णय (Landmark Case Laws)

🔹 Vinubhai Haribhai Malviya v. State of Gujarat (2019) 17 SCC 1

📌 सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“मजिस्ट्रेट के पास यह शक्ति है कि वह किसी भी समय जब तक आरोप तय न हुए हों, Further Investigation का आदेश दे सकता है।”

“पुलिस, वादी, अभियुक्त या मजिस्ट्रेट — सभी आगे की जांच की पहल कर सकते हैं। यह Article 21 के तहत निष्पक्ष विवेचना न्याय का अंग है।”

🔸 इस निर्णय ने ये स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट की शक्ति केवल FIR दर्ज कराने या पुलिस को जांच सौंपने तक सीमित नहीं है, वह चार्जशीट के बाद भी प्रभावी है।

🧭 Further Investigation की प्रक्रिया (Step-by-Step)

  1. वादी या अभियुक्त आवेदन देगा मजिस्ट्रेट को — स्पष्ट कारणों और साक्ष्य के साथ।
  2. मजिस्ट्रेट प्राथमिक जांच या विचार करेगा।
  3. यदि वह संतुष्ट हुआ, तो वह पुलिस को Further Investigation का आदेश देगा।
  4. पुलिस अग्रिम विवेचना कर पूरक चार्जशीट (Supplementary Charge Sheet) दाखिल करेगी।
  5. फिर मजिस्ट्रेट यह तय करेगा कि चार्ज लगाए जाएं या नहीं।

📌 निष्कर्ष:
• Further Investigation एक सशक्त न्यायिक उपचार है जो न सिर्फ वादी बल्कि अभियुक्त को भी न्याय दिलाने में मदद करती है।
• यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी जांच एकतरफा, अधूरी या पक्षपातपूर्ण न हो।
• BNSS धारा 193(9) और सुप्रीम कोर्ट का Vinubhai केस इस प्रावधान को न्यायिक रूप से मजबूत बनाते हैं।

महत्वपूर्ण :- अग्रिम विवेचना के लिए प्रार्थना पत्र चार्जशीट या अंतिम आख्या की जानकारी मिलने के बाद अविलम्ब न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया जाना चाहिये । प्रार्थना पत्र में उन साक्ष्य व तथ्यों का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिये जिन्हें विवेचना में विवेचक के द्वारा नज़रअंदाज़ किया गया हो।

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